Jis Din Tum Gaye : Some Goodbyes Never End: A Story of Love, Loss, and Silence

राघव को लोगों से ज़्यादा बातें करना कभी पसंद नहीं था।
बचपन में ही उसने सीख लिया था कि हर कोई हमेशा साथ नहीं रहता। जब वो बहुत छोटा था, एक प्लेन एक्सीडेंट में उसने अपने दोनों माता-पिता खो दिए थे।

लोग कहते थे — “वक़्त सब ठीक कर देता है।”
पर राघव के लिए वक़्त ने बस उसे चुप रहना ही सिखाया।

बैंगलोर में उसकी नौकरी थी।
अच्छी सैलरी, अच्छा फ्लैट, सब कुछ था…
बस ज़िंदगी में कोई “अपना” नहीं था।

फिर एक दिन वो मिली।
वो लड़की, जो बिना पूछे ही उसके दिन के बारे में पूछ लेती थी।
जो उसकी चुप्पियों को भी समझ लेती थी।
जिसके साथ बैठकर उसे कभी शब्द ढूँढने नहीं पड़ते थे।

राघव को पहली बार लगा —
शायद ज़िंदगी इतनी भी खाली नहीं है।
धीरे-धीरे, वही लड़की उसकी आदत बन गई…
और फिर उसकी दुनिया।

उन्होंने शादी की।
एक छोटा सा घर लिया…
जिसे उन्होंने मिलकर घर बनाया।
दीवारों पर तस्वीरें, बालकनी में पौधे,
और हर कोने में उनकी हँसी बसने लगी।

राघव अब कम चुप रहता था।
क्योंकि अब उसके पास कोई था,
जो उसकी हर बात सुनता था।
फिर एक दिन…
उसने बताया कि वो माँ बनने वाली है।
उस दिन राघव बहुत देर तक मुस्कुराता रहा।
उसे लगा जैसे ज़िंदगी ने पहली बार उसे कुछ लौटाया है।
उसने सोचा —
शायद अब सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन ज़िंदगी को शायद “ठीक” पसंद नहीं होता।

वो एक आम दिन था।
ऑफिस में काम ज़्यादा था।
मीटिंग्स, कॉल्स… और बीच में उसने अपना फोन साइलेंट पर रख दिया।
उधर…
घर में वो अकेली थी।
बाथरूम में उसका पैर फिसला।
एक आवाज़ आई…
और फिर सन्नाटा।
वो दर्द में थी…
डरी हुई…
और बार-बार राघव को कॉल कर रही थी।
लेकिन हर बार…
फोन बजता रहा,
और कोई उठाने वाला नहीं था।
कुछ देर बाद पड़ोसी ने दरवाज़ा खटखटाया।
आवाज़ सुनी… और अंदर आया।
तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

जब राघव को फोन आया,
तब उसका फोन साइलेंट नहीं था।
बस… अब सुनने के लिए कुछ बचा नहीं था।

वो भागते हुए अस्पताल पहुँचा।
उसने उसका हाथ पकड़ा…
जो अब ठंडा हो रहा था।
उसकी आँखों में देखता रहा,
जैसे वो अभी उठकर कुछ कह देगी।
पर इस बार…
वो चुप थी।
हमेशा के लिए।

उस दिन बहुत तेज़ बारिश हुई थी।
राघव को याद है 
क्योंकि वो भीगता हुआ घर आया था।
या शायद…
बारिश उसके अंदर हो रही थी।

घर का दरवाज़ा खोला तो सब कुछ वैसा ही था…
जैसा वो छोड़कर गया था।
बस वो नहीं थी।
किचन में उसकी चाय का कप रखा था।
सोफ़े पर उसका दुपट्टा…
और दीवार पर वो तस्वीर, जिसमें दोनों हँस रहे थे।
राघव उस घर में खड़ा था…
जहाँ अब सिर्फ़ यादें रहती थीं।
उस रात उसने पहली बार ज़ोर से रोना चाहा…
पर आवाज़ नहीं निकली।
जैसे दर्द भी चुप हो गया हो।

अब हर दिन उसके लिए एक जैसा था।
ऑफिस जाना, वापस आना…
और उस घर में लौटना,
जहाँ हर चीज़ उसे उसकी याद दिलाती थी।
सब कहते थे —
“मूव ऑन करो।”
लेकिन कोई ये नहीं बताता कि
जिसके साथ जीना सीखा हो…
उसके बिना कैसे जिया जाता है ?

राघव को आज भी लगता है…
अगर उस दिन फोन साइलेंट पर नहीं होता,
तो शायद…
पर कुछ “शायद” कभी पूरे नहीं होते।
और कुछ लोग…
कभी जाते नहीं हैं।
बस…
हमारी ज़िंदगी से होकर, हमारी साँसों में रह जाते हैं।

आज भी जब बारिश होती है,
राघव खिड़की के पास खड़ा रहता है।
और धीरे से कहता है -
“बरसता रहा देर तक उस दिन आसमान…
जिस दिन तुम गए…”

कुछ गिल्ट कभी जाते नहीं…
कुछ घाव कभी भरते नहीं…
कुछ लोग जो बिछड़ जाते हैं…
वो फिर कभी लौट कर आते नहीं…

Lyrics : Jis Din Tum Gaye | Shivay Misra | Sajeev Sarathie 

[Verse 1]
Barasta raha der tak us din aasman
Jis din tum gaye
Jis din tum gaye
Ek main hi nahi roya saara jahan
Jis din tum gaye
Jis din tum gaye

[Chorus]
Tere bin jiye kaise humne sikha hi nahi
Chal rahi hai saanse par hum jaise zinda hi nahi
Jis din tum gaye
Jis din tum gaye

[Instrumental]

[Verse 2]
Ek chhat hai sar pe mere ek mera bhi humraaz hai
Chhute jo duniya bhi toh ek dor toh mere haath hai
Le gaye apne sang tum mere saare gumaan
Jis din tum gaye
Jis din tum gaye

[Chorus]
Tere bin jiye kaise humne sikha hi nahi
Chal rahi hai saanse par hum jaise zinda hi nahi
Jis din tum gaye
Jis din tum gaye

[Verse 3]
Khaali se kamre hai sab chup chup si hai deewarein
Baithak hai ujdi ujdi aangan mein hai veerane
Kal tak jo ghar tha mera reh gaya bas makaan
Jis din tum gaye
Jis din tum gaye

[Chorus]
Tere bin jiye kaise humne sikha hi nahi
Chal rahi hai saanse par hum jaise zinda hi nahi
Jis din tum gaye
Jis din tum gaye
Jis din tum gaye

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