निशिगंधा : कुछ फूल रात में खिलते हैं…

निशिगंधा
कभी-कभी ज़िंदगी किसी फूल की तरह होती है…
जो अंधेरे में खिलता है और किसी को उसकी खुशबू का पता भी नहीं चलता...

साल था लगभग 1995
मैं एक टीवी सीरियल के लिए रिसर्च कर रहा था - उन लोगों की कहानियों पर, जिन्हें समाज अक्सर देखना ही नहीं चाहता।

उसी रिसर्च के दौरान मैं दिल्ली के एक रेड लाइट एरिया में पहुँचा।
वहाँ मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई।

उसका असली नाम क्या था, मुझे आज भी नहीं पता।
लेकिन उसकी आँखों में जो उदासी और मासूमियत थी, उसे देखकर मैंने मन ही मन उसका नाम रख दिया - निशिगंधा।

निशिगंधा…
रात में खिलने वाला फूल।

वो पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव की लड़की थी।
बहुत कम उम्र… शायद पंद्रह या सोलह साल।
गाँव के ही एक लड़के से उसे प्यार हो गया था।
उसे लगा था कि वही उसका संसार है।

घरवाले उस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे।
और एक दिन वह लड़के के साथ घर से भाग आई।
उसे लगा था कि वह एक नई जिंदगी की ओर जा रही है।
लेकिन शहर पहुँचते ही
उस लड़के ने उसे किसी के हाथों बेच दिया।

कुछ समय तक वह कोलकाता के एक कोठे में रही।
फिर किसी दलाल के जरिए उसे दिल्ली लाया गया।
और तब से…
वो वहीं है।

उसकी आँखों में एक अजीब सी खामोशी थी।
जैसे बहुत कुछ कहकर भी कुछ बाकी रह गया हो।
वो अपने गाँव को याद करती थी।
माँ को…
अपने पिता को…
और बचपन की उन दोपहरों को
जब जिंदगी अभी तक टूटी नहीं थी।

एक दिन उसके पास गाँव का ही एक आदमी ग्राहक बनकर आया।
उसी से उसे पता चला -
उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
भाई भी शहर में बस गया है।
मां को भी साथ ले गया।

गाँव में अब उसका कोई नहीं बचा।
वो लौट भी जाए तो
जाए कहाँ?
आज उस रेड लाइट एरिया की बाकी औरतें ही उसका परिवार हैं।
उसकी जिंदगी में कोई उम्मीद नहीं…
कोई सपना नहीं…
सिर्फ कुछ यादें हैं।
और उन यादों की हल्की सी खुशबू…

उसी खुशबू से जन्मा यह गीत है -
निशिगंधा।

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