कुछ मोहब्बतें…“दुआ” और “सलाम” के बीच ही रह जाती हैं।
पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में…
जहाँ शाम ढलते ही अज़ान की आवाज़ हवाओं में घुल जाती है,
वहीं था एक छोटा सा मोहल्ला …
जहाँ ज़्यादातर मुस्लिम परिवार रहते थे।
सादगी, तहज़ीब और अपनापन…
यही उस मोहल्ले की पहचान थी।
उसी मोहल्ले में रहता था एक लड़का -
अनवर।
एक सीधा-सादा, जिम्मेदार लड़का।
घर में तीन-चार भाई-बहन,
और सबकी ज़िम्मेदारी लगभग उसी के कंधों पर।
अब्बू की तबीयत अक्सर ठीक नहीं रहती थी,
अम्मी घर संभालती थीं,
और अनवर…
कम उम्र में ही बड़ा हो गया था।
सुबह काम पर निकलना,
शाम को थककर लौटना…
और फिर भी चेहरे पर एक सुकून, एक खिली खिली हँसी।
उसकी ज़िंदगी बहुत साधारण थी…
लेकिन दिल बहुत साफ़ था।
इसी मोहल्ले में, कुछ ही घर छोड़कर,
एक बड़ा सा दो-मंज़िला घर था,
जहाँ रहती थी रुक्साना।
रुक्साना का घर थोड़ा अलग था।
उसके अब्बू एक सम्मानित और सुलझे हुए इंसान थे,
मोहल्ले में उनकी अच्छी पहचान थी।
अम्मी घर को बेहद सलीके से संभालती थीं,
और घर में हर चीज़ में एक नफ़ासत झलकती थी।
और रुक्साना…
नरम मिज़ाज, सलीकेदार, और थोड़ी सी शर्मीली।
उसकी दुनिया सजी हुई थी,
लेकिन दिल… अभी भी कुछ ढूँढ रहा था।
दोनों की दुनिया अलग थी…
लेकिन रास्ते एक ही गली से गुजरते थे।
शुरुआत शायद किसी ख़ास दिन से नहीं हुई…
बस यूँ ही…
कभी पानी भरते वक्त,
कभी छत पर कपड़े सुखाते हुए,
कभी खिड़की के परदे के पीछे से…
उनकी नज़रें टकरा जाती थीं।
पहले बस एक हल्की सी मुस्कान थी…
फिर एक पहचान…
और फिर वही नज़रें…
एक आदत बन गईं।
वो कोई बड़ी मुलाक़ात नहीं थी…
ना कोई बातें, ना कोई वादे…
बस एक एहसास था,
कि कोई है, जो बिना कहे समझता है।
धीरे-धीरे…
उनकी खामोशी ही उनकी भाषा बन गई।
अनवर अब उस गली से यूँ ही नहीं गुजरता था…
वो ठहरता था।
और रुक्साना भी यूँ ही खिड़की तक नहीं आती थी…
वो इंतज़ार करती थी।
ये मोहब्बत शोर नहीं करती थी…
ये बस दिल में होती थी।
जैसे कोई दुआ…
जो सिर्फ खुदा से कही जाती है।
फिर एक दिन…
अनवर ने हिम्मत की।
सीधे कह नहीं पाया…
तो उसने रुक्साना की सहेली के ज़रिये एक पैग़ाम भिजवाया -l
"अगर तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए वही एहसास है…
तो आज शाम, ठीक 8 बजे, खिड़की पर आ जाना…
मैं नीचे नुक्कड़ पर इंतज़ार करूँगा…"
वो एक ऐसा पल था…
जहाँ खामोश मोहब्बत को आवाज़ मिलने वाली थी।
लेकिन किस्मत…
अक्सर अपनी ही कहानी लिखती है।
उसी दिन घर में शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं,
रिश्तेदारों का आना-जाना,
हँसी-खुशी, शोर…
और उसके अब्बू ने उसे पास बैठा लिया -
"तुम गेस्ट लिस्ट संभालो…
कौन आ रहा है, कौन नहीं… सब लिखो।"
वो उठना चाहती थी…
खिड़की तक जाना चाहती थी…
बस एक बार उसे देख लेना चाहती थी…
लेकिन वो जा नहीं पाई।
उधर…
अनवर उसी नुक्कड़ पर खड़ा रहा।
हर आती-जाती हवा में उसका नाम ढूँढता रहा…
हर पल उम्मीद करता रहा कि
शायद अब वो खिड़की खुलेगी…
मगर वो खिड़की उस दिन बंद ही रही।
उस दिन…
न इज़हार हुआ,
न मुलाक़ात…
बस मोहब्बत…
और भी गहरी हो गई।
कभी-कभी प्यार हारता नहीं है…
बस वक्त साथ नहीं देता।
और कुछ मोहब्बतें…
हमेशा “दुआ” और “सलाम” के बीच ही रह जाती हैं।
सुनिए "दुआ सलाम" की दास्तान स्पॉटीफाई पर इस ओरिजिनल गीत के साथ। लिंक पहले कमेंट में है, अगर पसंद आए तो इसे खूब सारा प्यार दें, सुने और सुनाएं
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Dua Salaam on Spotify
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