ख्वाबों को जीना है : एक छोटी सी कहानी, बड़ी सी जिद
दिल्ली की सर्द शामों में, जब धूप जल्दी थक जाती है,
सौरभ अपने कमरे के आईने के सामने खड़ा होकर
हर रोज़ एक नया किरदार जीता था।
उसके सपने बड़े थे,
पर घर छोटा था…
और ज़िम्मेदारियाँ, उनसे भी बड़ी।
माँ की दवाइयों की खुशबू
और अधूरी नींद के बीच भी
उसने अपने ख्वाबों को कभी सोने नहीं दिया।
मुंबई उसके लिए सिर्फ़ एक शहर नहीं था,
एक सवाल था
“क्या मैं सच में वहाँ तक पहुँच सकता हूँ?”
फिर एक दिन,
दिल्ली के एक छोटे से मंच पर
उसकी आवाज़ किसी बड़े नाम तक पहुँच गई।
एक कॉल आई,
एक टिकट आई…
और पहली बार, सौरभ ने आसमान को इतने करीब से देखा।
मुंबई ने उसे बुलाया था।
ऑडिशन अच्छा हुआ,
लोगों ने सराहा भी…
पर कहानी वहाँ नहीं बदली,
जहाँ उसे बदलना चाहिए था।
किसी और का नाम,
किसी और का हक़ बन गया।
उसे कहा गया —
“अगली बार…”
और हाथ में एक वापसी की टिकट थमा दी गई।
उस रात,
मरीन ड्राइव की खामोशी में
लहरों ने उससे कुछ पूछा नहीं,
बस सुनती रहीं।
एक दोस्त ने समझाया
“यहाँ सब आसान नहीं होता…”
सौरभ मुस्कुराया।
थोड़ा टूटा हुआ था,
पर पहली बार साफ़ था।
उसने उस टिकट को देखा,
जैसे वो सिर्फ़ कागज़ नहीं,
एक रास्ता था…
जो उसे वापस ले जा सकता था।
फिर उसने धीरे से कहा —
“ये मुंबई की नमकीन हवा…
शायद मुझे पहचानती है।
और मुझे लगता है…
मैं यहीं के लिए बना हूँ।”
अगले ही पल,
टिकट के छोटे-छोटे टुकड़े
समंदर में घुल गए।
और एक नया सफर शुरू हुआ —
बिना टिकट, बिना गारंटी…
बस एक जिद के साथ —
ख्वाबों को जीना है।
तो ये तो थी गीत की कहानी, अब गीत भी सुनिए
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